बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

प्रेम एक विस्तार है
मृगतृष्णा भी है -
प्यासे को पानी नहीं 
पानी की चमक के पीछे पीछे 
दौड़ते दौड़ते शाम हो जाती है 
चमक खतम हो जाती है 
मुँह खुला का खुला रह जाता है -
प्रेम में पागल जो  भी हुयें हैं 
उनका पागलपन ही प्रेम है 
अपने से या दूसरों से 
एक छोर से दूसरे छोर तक
इन्द्रधनुष का झुकाव 
वही तो है जहाँ पर 
बारिश भी है धूप भी है 
प्रेम के दीवाने दिखावा नहीं करते 
नहीं लगाते तख्तियाँ
जिन पर लिखे रहते हैं 
वायदे और शर्तें –
प्रेम एक पुष्प है –
कोई भी हो सकता है –
लाल रंग का गुलाब 
(मुँह पर फेका गया तेज़ाब !)
चंपा, चमेली, गुलाल 
बसंती बयार, हिरनी की चाल,
सरसो का पीलापन, महुआ का सोंधापन 
कोयल की कूक, ह्रदय में हूक
उपमाएं, प्रतिमान और प्रतीक 
उतने ही रूप  जितने प्रेमी 
सागर के होठ मुस्कराते, चुप 
भँवर में गहरे ले जाकर 
छुपा देते  हैं उर्जा को –
एक न एक दिन हम सभी 
प्रेम करते हैं – विफल या सफल 
वो मायने नहीं रखता 
मायने वही रखता है 
जो सागर की तलहटी में
कोरल की तरह  खिला हुआ 
शांत बैठा है, मनो पानी भी 
उसे गला कर मिटटी 
नहीं कर पाती है – 
वही प्रेम है, क्या वही प्रेम है –
प्राचीन, मौन, निर्विकार 
(मनुष्यों द्वारा किया गया बलात्कार !)
विषय-वासना और उपासना की राह पर बैठा – ज्ञानमार्गी –
भक्ति से ज्ञान की यात्रा –
या भक्ति और ज्ञान दोनों 
क्या वही प्रेम है -
क्या प्रेम एक विन्दु है -
क्या प्रेम एक चक्र है -
स्वधिस्थान, विसुद्ध, अनहत, मूलाधार - 
या निराकार का विस्तार !
Photo: Courtesy Google

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

कविता शाश्वत है, दुःख शाश्वत है, जैसे माँ और बाबूजी का जाना

नुनू बाबा (जो भजन गाया करते थे ) भी मांझी के पुल से 
लौट कर धर नहीं आए थे पर 
लगा नहीं था डर
ऐसा लगा था जैसे सभी सहमे सहमे अँधेरी रात में 
बातें करते उनका घर आने का कर रहे थे इंतजार !
बाबा के जाने पर मेरी कक्षा में आकर दरवान ने 
दिया था बाबूजी का संक्षिप्त सन्देश 
मैं बहुत दूर था अपनों, अपने घर और अपनी धरती से 
लेकिन बाबा के जाने का, (जो मेरे मित्र भी थे, और सहृदय पाठक थे )
और इया के जाने का, ( जो उम्र ढलने पर भी  बैठे बैठे अपनी बची हुई उर्जा से 
कार्मिक कविता लिखती थीं, मना  करने पर भी घर के छोटे छोटे काम करके, 
जिनको बिरले ही कोई याद करता हो आज ) 
,
उस दुनिया में जहाँ हमें भी जाना है, कब  - पता नहीं !
रोज़ किसी  न किसी के जाने की खबर मिलती रहती है,
अभी कल ही खबर मिली कि मास्टर साहेब भी (जो कि कवि नहीं थे)
चुपचाप उठे और चले गए अनन्त यात्रा पर  
सुनकर पहले की तरह दुःख भी होता है 
लेकिन उससे ज्यादा होता है डर !
कविता के कोमलता और सहजता के जाने का डर 
एक अलिखित और मधुर संस्कार के मर जाने का डर 
जो केवल हाथ हवा में उठाकर 
और गला फाड़कर इन्कलाब जिंदाबाद 
कहने से जिन्दा नहीं हो पाता !
लेकिन
किसी जीवंत कवि के जाने के बाद 
कविता फिर से जी उठती है !

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022

तुम एक शरीर नहीं हो सकते 
आत्मा भी नहीं
शरीर  का  दुःख जिसने झेला है 
शरीर का सुख जिसने भोगा है 
मुखमंडल पर उतरा हुआ दर्प 
समय के धामिन सांप  ने पैरो  को जकड लिया 
आगे  बढ़ना ही है - लेकिन कितना  आगे !
रूप-अरूप , व्यक्त-अव्यक्त  का झमेला  
तुमने ही  खड़ा किया है 
तुम एक आत्मा  नहीं  हो सकते !
हम  अपने  भविष्य  के
बारे में  चिंतित  रहते हैं - और
हम सभी जानते  है 
कि हमारा  भविष्य क्या है !

सदियों से रचे  गए  शास्त्रों ने
कोई  बदलाव नहीं किया है इसमें !

कितने  असहाय हैं  हम !

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

लकीरों के भी 
अपने आयाम होते हैं 
जिन्हें वे समझ नहीं पाते हैं 
तभी तो उनका लकीर का फ़क़ीर होना 
उनके तालीवादकों के लिए 
गौरव की बात है
हालाँकि ये और बात है
कि गाली कौन दिलवा रहा है
और ताली कौन बजवा रहा है 
लेकिन एक बात तो तय है 
कि वो लकीर का फ़क़ीर 
ही होगा ।
@akp 2019

सोमवार, 31 जनवरी 2022

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌৷৷15.5৷৷

जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं॥5॥

Free from pride and delusion, with the evil of attachment conquered, ever dwelling in the Self, their desires having completely turned away, liberated from the pairs of opposites known as pleasure and pain, the un-deluded reach that Goal Eternal.

शनिवार, 29 जनवरी 2022

वक़्त के सर्द लम्हों से ग़र  हो तुम्हारी मुलाक़ात/ तो उन्हें हँस के, फ़ख़्र से, ग़र्मजोशी से गले लगा / अलाव के घेरे  की बैठकी के  हमनवा वे न भी हो / ग़र तुम्हारे सब्र के उस्ताद-ए -हर्फ़ न भी हों / तो तुम उन्हें अपने तब्दील- ए -वक़्त का सिला तो दे । 
@anilprasad
30.01.2021

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

ग़र कोई है मेरे पीछे -
तो वो तुम हो - और इसके सिवाय 
बस ग़म है - खोलता हूँ
सफ़हा सफ़हा तुम्हें 
हर्फ़-बा-हर्फ़
सतरे सतरे हमराह तुम 
लब-बंद आवाज़ कोई तुमसे सीखे
सदियों की सदाएँ सुनाई देती है 
अहसास की लौ पर तुम्हारे साथ 
जैसे इस सर्द फ़ज्र में 
तुम्हारा हाथ अपने हाथों में लिए 
क़िल्लत -ए -वक़्त से मैं ग़मज़दा हूँ 
और 
तुम्हारी नर्म-गर्म तासीर मुझे 
मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है ! 
@anilprasad 
29.01.2021
A place 
In the corner
Of a room
Well-lighted
Darkness dwindles
Voyage kindles
Tea is a boat
Takes to the shore
To disembark
For a while
And again more
Out of gloom
In the space
Thrilled and free
Amid the roar 
Of the waves
Silence speaks
Loud and clear:
The seagull,
From the mountain 
The eyes of an eagle,
The fish swim
Unaware and free
The water flows
The boat goes
On and on ...

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

बहुत दिनों के बाद दिखी धूप
और 
बालकनी का दरवाज़ा हल्की 
अँगड़ाई
लेकर कुंडे से कहा 
कह दो 
उन्हें जो सोफ़े पर ठण्ड
ओढ़ कर 
बैठे हैं ज़रा गर्म हो लें 
कल 
आसमान में आफ़ताब हो न हो 
मैं मुस्कुराया और बालकनी में आया 
और 
बाहर की हवा ने तल्ख़ी-ए- अय्याम से कराया रू-ब-रू 
और 
मैं ख़ामोश हो गया -
आफ़ताब 
को भी ऊँची इमारतों के पीछे 
ढलती हुई 
शाम ने आग़ोश में ले लिया था । 

@anilprasad
27.01.2021

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

क्यों बनाया 
एक तिलस्मी संसार ?
जैसे जैसे बढ़ रहाहूँ
मंजिल की तरफ
(अगर कोई मंजिल है !)
रहस्य गहराता जा रहा है!

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

शब्द जो बोल नहीं सकते

क्या शब्दों से संस्कार की घाटी में
प्रतिध्वनियाँ होती हैं ?
अगर हाँ तो शब्द गिरगिटों की तरह
रंग क्यों बदल रहे हैं ?
मंडूको की तरह बेमौसम अपने कूपों में बैठ
राग क्यों आलापते है ?
स्वार्थ के परकोटे पर बैठ
कलम कुछ भी नहीं लिखते हैं
वही लिखते हैं जिनकी पकड़
उँगलियों पर होती हैं, एक असत्य और
अहिंसक वर्णमाला से बने शब्द
जिस मिटटी से बने हैं
उस मिटटी को कोसने वाले शब्द
पुस्तको के पन्नो के बीच
बैठाये हुए शब्द जो बोल नहीं सकते
भेद खोल नहीं सकते
विचारधारा के कारावास में बंद शब्द
अखबार और पत्रिकाएँ सूत्रधारित हैं
शब्द पुत्तलिकाएं हैं
उँगलियों में कलम के बदले धागें  हैं
संस्कार आत्मग्लानी की खाई में छुपा बैठा है
क्योकि उसको ढोने वाले आधुनिकता को
पचा नहीं पाए हैं, उनके लिए दूर का ढोल सुहावना है
लेखकों, कविताओं, उपन्यासों और आलेखों को आलोचित करने वाले बैठे हैं
संगठित शोध कर शब्दों में ढाल रहें है
अपनी अपनी जगहों से आवंटित और सुरक्षित कर रहें हैं
इतिहास की किताबों में स्वयं को आलोकित कर रहे हैं
पुनर्लेखन, विमोचन, पुनर्पठन और लेखनी की हत्या का लोकार्पण
कंप्यूटर के की-बोर्ड से नहीं हुआ है, लेखनी की हत्या
विचारधारा की कुंद धार की मार से हुआ है
जिसने संस्कार को लाल वस्त्रों में बाँध कर चौराहे पर फेंक दिया है
विद्वता की परिभाषा बदलने में शब्द सहायक हुए हैं
उनके गढ़ें हुए शब्द जो तलवारों और तोपों के
बदले शांति के समय निरंतर चलाये जा सकते हैं
सूत्रधारित शब्द, संगठित शब्द, सुकुंठित शब्द
रात-दिन अँधेरे में उँगलियों को जोर से पकडे चलते रहते हैं
उँगलियों के दबाते ही बंदूक  की नाल से निकल
विस्फोट करते हैं, स्फोट नहीं , ब्रह्मनाद नहीं  
मानवता विस्फोट से आसक्त है, विद्या-व्यसनी नहीं
ब्रह्म का रूप बदलने में सफल हुई है शब्दों के मायाजाल से
संस्कार जंगलों में विचरती एक सुन्दर नवयौवना है
(जिसे कोई भी कलाकार आधुनिकता की होड़ में नग्न दिखा सकता है,
विस्फोट होगा, लेकिन प्रसिद्धि मिलेगी, लोग दलों में विभाजित होगें ! )
जहाँ जगलों में वृक्षों की संख्या दिन-प्रति-दिन कम होती जा रही है
जंगल में शब्दों की कमी से बाघ शहरों की तरफ भाग रहे हैं
गिलहरियाँ सैनिको के शब्द-विन्यास को समझना चाह रहीं हैं
शब्दों से वृक्षों को उगाने में मानवता की कोई बराबरी नहीं कर सकता
जानते हुए भी जानवर चिड़ियाखाने में शरण ले रहे हैं
शब्दों से गाँवो और कस्बों को परिभाषित करने में
साहित्यकारों का कोई सानी नहीं रखता
जानते हुए भी लोग शहरों की ओर पलायन कर रहें हैं,
उनके पास शब्द नहीं हैं
शब्दों की तिजोरी सांसदों के पास है, नेताओं के पास है  
जिन्हें वे मुक्तहस्त दानशीलता से जनता के सामने खोल देते हैं:
कुछ शब्द युधिष्ठिर, कुछ दुर्योधन, कुछ कृष्ण, कुछ गांधारी, कुछ भीष्म,
कुछ शकुनी, कुछ विदुर, कुछ अभिमन्यु की तरह अपनों से धिरे,
युद्ध के मैदान में अपनों से मारे जाते हैं –
आज उत्तरआधुनिकतावाद और भूमंडलीकरण के दौर में
शब्दों की खरीद बिक्री भी होती है, उन्हें तौलना जरूरी नहीं है
लेकिन अक्सर मैं उन्हें धुलते देखता हूँ
नुक्कड़ की दूकान पर एक आदमी को उन्हें
गरम पानी में धोते हुए देखता हूँ
पुराने शब्दों को नए वस्त्र पहन कर
बाज़ार में अकड़ कर घूमते देखता हूँ
अब मैं केवल शब्दों को देखता हूँ
महसूस नहीं कर पाता !

आप बता सकते हैं क्यों ?





रविवार, 29 नवंबर 2015

गति

जिन्हें मैं मील का पत्त्थर 
समझ कर पूजता था और 
जिनके पास पहुँचने के लिए 
दुर्गम रास्ते चला मैं 
पर आज वो छूट गए हैं पीछे 
खड़े हैं खँडहर से –
मुखर महत्वपूर्ण मानक थे 
अब हैं मूक – 
क्योंकि -
जिंदगी आगे बढती गई है 
नए मानकों को गढ़ती गई है 
रास्ते को अकेलापन भी है
डर भी, भूतकाल की चिताएं 
धू-धू कर के जल रहीं हैं 
शव के अवशेष –
हड्डियाँ, गर्म राख, 
अधजली लकड़ियाँ,
श्मशान-वैराग्य लिए 
घर लौटते स्वजन, परिजन –
रास्ता भी लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ
और आगे बढ़ता हुआ मग्न 
और चौराहे पर खड़ा मैं –
धीरे-धीरे लोग अजनबी होते जा रहे हैं !
मील का पत्त्थर और आगे हैं 
शायद दूर, बहुत दूर 
फिर भी चलना तो पड़ेगा ही 
गति से ही गंतव्य है !

पराधीन


प्रबल-अहंकार लीन 
बुद्धि छारण-छरण छीन 
छद्म-शालीन ह्रदय-हीन
मुख-मंडल दर्प-हीन 
लेखन-पठन-पाठन दिशा-हीन
भव्य-तर्क अर्थ विहीन 
अन्धानुकरण विचार-धारा-रंगीन 
सम्वाद-वाद-विवाद वस्त्र-विहीन 
स्वम्भू-प्रतिनिधि आत्मलीन
सम्पूर्ण संसार टी वी स्क्रीन
उत्तेजक भाषा भाव-हीन 
जानकार चक्षु-हीन 
जानकर चक्षु -हीन !

महापर्व


सूर्य उर्जा का प्रतीक
जल जीवन का 
फल-फरहरी यौवन का 
अर्घ्य आस्था का 
ब्रत संयम का 
प्रसाद फल का 
स्वछता स्वास्थ्य का 
स्वछंदता प्रलय का 
अस्त होना उत्थान का 
उदय नई आशा का 
नदी-घाट सौहार्द्र का 
कर्म सामर्थ्य का 
समापन प्रारंभ का 
एक नई प्रतिबद्धता का 
एक नई सोच का !

क्या मृत्यु जीवन का विस्तार है ?


मैं रात में जल्दी सोता हूँ, सुबह जल्दी उठता हूँ l कल रात नींद नहीं आ रही थी l कारण, शायद एक बहुत ही आदरणीय घनिष्ट से शाम को फ़ोन पर बात-चीत और उनका बहुत बृद्ध होना और पल-पल कमजोर होना, निरंतर मृत्यु की ओर बढ़ते जाना कहीं मेरे अंतस मन में बैठ गया था l फिर मैं तकिये के बगल में रखी डायरी और कलम लेकर लिखने लगा और ये कविता कागज पर उतर आई l मेरी ज्यादातर कविताएँ ऐसी ही आती हैं; सुबह उठने पर जिस भाषा में विचारों का प्रवाह आता है; भोजपुरी, अंग्रेजी या हिंदी में उसको मैं तुरत डायरी में लिख लेता हूँ या टाइप कर देता हूँ l हो सकता हो ये भाव मेरे मन में कई वर्षों से हों लेकिन कल रात इनको मौका मिला बाहर निकलने का ! फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के हीरामन की तरह हम सभी एक बार जरूर सोचते होंगे जीवन के औचित्य के बारे में l 
आरम्भ से जीवन का धीरे-धीरे एक बिंदु से वृत्त बन जाना, फिर मृत्यु हम सभी को निराकार कर देती है l उसके बाद क्या है ? क्यों है ऐसा ? क्या प्रयोजन है ? प्रकृति को पता हो सकता है, मानव को नहीं क्योकि प्रकृति मानव के ज्यादा शक्तिशाली है l पतझड़ के समय पत्तों का मौन इंगित करता है मनुष्य के जीवन के अंत का भी जिसके बारे में किसी को भी नहीं पता है l उसके बाद अन्धकार ही अन्धकार है !
विस्तार 
1.
एक सूक्ष्म बिन्दु, मुक्त-उन्मुक्त-अरूप-
बढ़ते-बढ़ते-बनते-बिगड़ते, हँसते-खेलते 
लहरों की पतवार ले, डूबते-उतराते
फैलते-फैलाते बन जाता है-
बाहर आना आसान नहीं होता,
अंतर्यात्रा नियति है मानो, न मानो 
फिसलते-जूझते-गिरते-पड़ते वातावर्त से
और रूप अचानक एक दिन हो जाता है
जड़, निष्प्राण, निरर्थक 
(दीवारो पर टंगा हुआ) 
विदेह और निराकार !
2.
क्यों ? किसलिए ? 
शाश्वत प्रश्न है 
निरूत्तर करता हुआ 
सदियों की जिज्ञासा को
लेकिन शायद पत्तियों को पता है 
वायु को इसकी भनक है 
जमीन और जल को जानकारी है 
क्यों, कहाँ और कब होगी वर्षा 
और कब पड़ेगा सूखा 
प्रलय में होगें कितने विलीन 
कितने होगें बेघर, शांत सागर में 
कितनों की किश्तियाँ डूबेगीं !
3.
और पत्तियों को पता है-
धरती पर मौन पड़े 
उनके मुस्कान का पीलापन 
देता है संकेत
मृत्यु के किए गए 
विस्तार का 
बिन्दु से वृत्त का 
वृत्त से निराकार का 
बस इतना ही है 
इसके आगे है अन्धकार 
से प्रकाशित वह मार्ग 
जिसपर स्वयं चलना है 
विज्ञान और शास्त्रों का ज्ञान 
प्रज्वलित नहीं करता एक दीप भी 
राह में उस द्वीप के !

माटी को भी नहीं पता


कहाँ जाना है ?
किधर? 
कौन से गाँव ?
कौन सा शहर ?
घूमते घुमाते
बस चलते ही जाना है !
स्थिर होने पर भी 
विचारों के साथ !
पान बनवाने गया था 
कल ही की तो बात हो जैसे, 
लोग आए थे, बाबूजी ने भेजा था 
ट्रेन में बैठा था अडयार जा रहा था 
सोचा यहाँ तक आ गया 
तो वहां भी धूम लूँ !
एक कमरे में बैठा हूँ 
वारुणी नदी के किनारे
राजघाट बनारस में 
अँधेरा आ सन्नाटों के बीच 
दरवाजे पर दस्तक होती है 
एक बुजुर्ग महिला है कुछ पूछ रहीं हैं 
सारनाथ जाना है, घूमने आईं हैं 
विदेश से इस देश की मिटटी 
ले जायेगीं, नदी के तट से, 
अपने मूर्तिकार मित्र के लिए
मैं सोचता रहा कैसी कल्पना है 
कैसा प्रेम धरती से, माटी से 
हम सारनाथ गए साथ साथ 
अचानक एक कार्ड देख कर 
याद आया, फिर लौटने के बाद 
मैंने कृष्णमूर्ति का ऑडियो कैसेट 
ख़रीदा था बाबूजी के लिए, 
बाबूजी ने तो दिया था 
कृष्णमूर्ति की जीवनी 
जो मैरी लुटयंस ने लिखा था 
पढ़ रहा हूँ बैंगलोर से अडयार जाते वक्त 
बस में वो छोटा बच्चा
अपनी माँ की गोद में बैठा 
मेरी तरफ बार-बार हाथ 
बढ़ा रहा था, मोहक था दृश्य 
वहां खरीदी मैंने एक छोटी सी गीता 
ऐनी बेसेंट ने लिखी थी उसकी भूमिका 
बड़े बरगद के नीचे बैठा अकेला, 
बरसों से बरगद एक ही जगह खड़ा था 
अपनी शाखाओ के साथ, मुझे पता था 
पता था पटना आना है लौट कर
लेकिन अब फिर कहाँ जाना है 
ये नहीं पता था !

वो सूरज भी अपना ही था




निकल रहा हूँ
अनिश्चितता और अनजाने
भय के साथ सामान बांध कर
प्लेटफार्म पर खड़ा हूँ
मित्र छोड़ने आए हैं
रास्ता कई पड़ावों भरा है
पहला पड़ाव दिल्ली
पहुंचता हूँ एक परिचित के यहाँ
डेरा डालता हूँ, संकोच के साथ
सरहद पार करनी है
सरहदों को पार करने के लिए
कागजों की जरूरत होती है
और कागजों पर मुहरों की
कागजों  से भरी फाइल
और अनजाना  भय
दोनों बैग से सर निकाल कर
बार-बार मेरा मुंह देख रहे हैं !
विघ्नों के बीच काम पूरा हुआ !
फिर निकलता हूँ
पहुंचता हूँ बम्बई, नितांत अपरिचित के यहाँ
डेरा डालता हूँ, सुबह से शुरू होती है
सरहद पार करने के पहले की दौड़-धूप
जमीन से आसमान में उड़ने की
जिसे हम अभी बाँट नहीं सके
लौट कर शाम को आना थकान के साथ,
चाय के बाद घर  की बच्ची से चर्चा
साहित्य पर, बच्ची मंटो पढ़ रही है
कितने सवाल हैं उसके मन में
पूछती है मैं जवाब देता हूँ,
बाबूजी ने ही दिया था मंटो को पढने के लिए
सभी कहानियाँ हैं जेहन में,
मंटो को पढना अपने आप को पढना है
आईने के सामने खड़े होना हैं, उन जगहों पर
जाना है जहाँ समाज जाने की स्वीकृति नहीं देता
वहाँ मंटो धक्के देते हुए जाने को मजबूर करते हैं
शब्दों से बुनते है छोटी छोटी कहानियों में
एक विस्तृत फलक जिससे होकर  जमीर की रोशनी
रूह पर उजाला फैलाती है एक अलग सोच का
जिससे समाज ने इंसान को महरूम रखा था
बड़ी–बड़ी आखों वाली बच्ची आश्चर्यचकित  है,
स्नेह्मयी  शांतिस्वरूपा खो गई है कही
मंटो की झकझोरती रचना संसार में,
इस संसार में भी, पता नहीं कहाँ ?
फिर कभी  सुना नहीं, मिला नहीं !
फिर निकल रहा हूँ
कौन था मैं ? कहाँ जा रहा था ?
मेरा गंतव्य कहाँ है ?
पूरा पता नहीं है!
जगह का नाम, देश का नाम पता है
ह्रदय की धड़कन क़दमों से बहुत तेज
टैक्सी  रूकती है, कागजों की फाइल है हाथ में
और एक पीछे छूटती, ओझल होती दुनिया साथ में!
सुबह पहुँचता हूँ एक नई धरती पर
गेस्ट हाउस में नए पुराने चेहरे
नई दुनिया नया परिवेश
फिर निकल जाता हूँ
साथ में पासपोर्ट है और नए मित्र
कार में बैठ पहाड़ी रास्ता तय करता हूँ
सूरज और बादल साथ साथ चलते हैं
शाम पहाड़ियों से झांकती है
सूरज उसे इशारे कर लौट जाता है
पहाड़ियों  के पीछे  धीरे-धीरे
धीरे-धीरे अँधेरा घाना होता जा रहा है
गंतव्य आता है, थोड़ी थकान लिए हुए
घर की चाभी हाथ में मिलती है
रात का समय है
चिन्ताएँ पलकों पर बैठ ऊँघने लगी हैं
झरने के पानी के साथ आँखे खोलता हूँ
खिडकी के बाहर देखता हूँ
फिर सुबह  होगी, मुझे पता था !